आधुनिकीकरण © आज का भारत

 

डॉ0 सुधीर कुमार राय

एसशिएट प्रफेसर, समाजशास्त्र्-विभाग, उदय प्रताप स्वायत्तशासी महाविद्यालय, वाराणसी।

 

 

आज कल का परिणाम ¨ता है। वर्तमान का भारत भी अपने अतीत का प्रतिफल है। ©पनिवेशिक संरक्षण में उपजा भारतीय नवजागरण अपने प्रादुर्भाव के समय से ही अन्तर्विर¨¨ में रहा है। भारत पश्चिमी प्रभाव में जिस प्रकार शक्ति पर आधारित राजनीतिक समाज में बदलता जा रहा है, वह केवल अभारतीय है, वरन् सभ्यताअ¨ की विषमता के कारण इसके सामाजिक पर्यावरण में भी अभूतपूर्व विकृतियाँ जन्म ल्¨ रही हैं। क्य¨ंकि यहाँ मनुष्य ¨ यंत्र्ा मानने वाली मशीनी अवधारणा छिपी है, ¨ अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी की ¨¨ तथा मशीनी यन्त्र्ा¨ की अति मानवीय शक्तिय¨ से चमत्कृत ¨कर मनुष्य ¨ भी एक स्वचालित जैविक यंत्र्ा विश्¨ ही मान बैठा।

 

आधुनिकता से तर्कबुद्धि, मानवता © स्वतंत्र्ाता का विचार जुड़ा हुआ है। ¨¨पीय नवजागरण क्रान्तिकारी मानवतावाद ल्¨कर आया था। फ्रांसीसी राज्यक्रान्ति के आदशर्¨ सिद्धान्त¨ से भी उसका गहरा सम्बन्ध था। फ्रांस की राज्यक्रान्ति के तीन नारे- स्वतंत्र्ाता, समानता © विश्वबन्धुत्व थ्¨ यही अवधारणाएँ आगे चलकर राष्ट्र-राज्य की नवीन संकल्पना का मूलाधार बनीं। एतदर्थ, इनके ऐतिहासिक संदर्भ-विषय ¨ भी समझना ¨गा। कालान्तर की धर्मनिरपेक्षता, ¨कतंत्र्ा समाजवाद की अवधारणा भी उन्हीं पर निर्भर है। यहाँ ¨ प्रश्न था- स्वतंत्र्ाता, समानता, विश्वबन्धुत्व किसके तथा किनके बीच तथा ¨कतंत्र्ा © धर्मनिरपेक्षता क्य¨? स्वतंत्र्ाता धर्म © चर्च की जकड़बन्दी से। समानता कुलीन तथा आम आदमी के बीच। विश्वबन्धुत्व उद्यमिय¨ © श्रमजीविय¨ के मध्य। ¨कतंत्र्ा वंशानुगत सामंती विश्¨षाधिकार¨ की समाप्ति के लिए। धर्मनिरपेक्षता मध्ययुगीन धर्मानुम¨दित राज्य सभा द्वारा कुलीनतंत्र्ा के जन्मसिद्ध अधिकार¨ की सुरक्षा तथा संरक्षण के अन्त के लिए। समाजवाद सामाजिक सम्पत्ति के असमान वितरण ¨ खत्म कर समानतामूलक समाज की स्थापना के लिए।

 

 

यूर¨ का नवजागरण अपने ईमानदार इराद¨ तथा मंतव्य¨ के लिए जनता के पक्ष में जनता द्वारा लड़ा गया आन्द¨लन था। इसका नेतृत्व मध्यवर्ग द्वारा किया गया था तथा उसकी अपनी निश्चित विचारधारा थी। वस्तुतः इसकी ©द्धिक नींव फ्रांसीसी क्रान्ति के अग्रणी बुद्धिजीविय¨ ने तैयार की थी। ये बुद्धिजीवी मध्यवर्ग के थ्¨ क्य¨ंकि वे अभ्युदयशील पूंजीवाद के ©द्धिक प्रवक्ता थ्¨ वे ¨ पूरी तरह कुलीनतंत्र्ा के हिस्सा थ्¨ ही पूरी तरह ©द्य¨गिक सर्वहारा की श्रेणी में ही थ्¨ वे स्वतंत्र्ा उद्यम अवसर की समानता के हिमायती थ्¨ सामंतवाद की बंद अर्थव्यवस्था वाल्¨ समाज के लिए वे अनजाने से थ्¨ सामंती निरंकुशता तथा चर्च की जकड़बन्दी से आमजन की मुक्ति हेतु स्वतंत्र्ाता, समानता, विश्वबन्धुत्व, ¨कतंत्र्ा, धर्मनिरपेक्षता जैसे अधुनातन जीवन मूल्य¨ ¨ उन्ह¨ंने विचारधारात्मक हथियार के रूप में अपनाया। खुली प्रतिय¨गिता © मुक्त व्यापार उसी की प्रतिध्वनि थी। ग्राम्शी ने इस नवीन ©द्धिक उत्थान ¨ सांस्कृतिक नवजागरण कहा है। यह सच है कि फ्रांसीसी क्रांति के स्वप्न पूरी तरह किसी भी देश समाज में फलीभूत नहीं हुए, किन्तु इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि उसके आदशर्¨ ¨ जीवन-मूल्य बनाकर उपनिवेश¨ से मुक्ति के लिए लड़ी गयीं साम्राज्यवाद विर¨धी लड़ाइयाँ उन्हीं मूल्य¨ की ¨ सचेत करती हैं, ¨ फ्रांसीसी राज्यक्रांति के अपने मूल्य थ्¨ आज जब यह कहा जाता है कि सभ्यताअ¨ के संघर्ष के नाम पर दुनिया ¨ बांटकर आपस में मत लड़ाअ¨, ¨ शायद विश्वबन्धुत्व की ही बात कही जा रही ¨ती है, जिसका दूसरा नाम- भाईचारा, धर्मनिरपेक्षता © समाजवाद है।

 

स्वतंत्र्ाता का विचार आधुनिकता से आबद्ध है। इसकी जड़ें तर्क-विवेक में हैं। आधुनिक समाज की तुलना में पूर्व ©द्य¨गिक समाज¨ में सहकारिता के तत्त्व हैं। वहाँ जीवन के विविध पक्ष एक समग्रता में बंध्¨ ¨ते हैं। धार्मिक विश्वास उन्हें ¨ड़ने का कार्य करता है। आज के आधुनिक समाज में व्यक्ति की विशिष्ट स्थिति पूर्व से काफी बदल चुकी है। इसमें अर्थ एवं अनुभव बिल्कुल नये अंदाज में हैं। आधुनिक जीवन के बिखराव ¨ साधारणतः बहुलवाद की संज्ञा से अभिहीत कर दिया जाता है। यह सामाजिक व्यवहार के स्तर पर दिखायी देता है तथा उसकी अभिव्यक्ति चेतना के धरातल पर भी हुई है।

आधुनिकता की शक्ति वैयक्तिकता में है। ¨काचारी उदारवादी आधुनिकता में चयन की छूट है © सामूहिकता का सर्वथा अभाव। यहाँ मनुष्य अपना भाग्य विधाता खुद है, भाग्य ¨ बेकार करार दिया गया है। यही विश्वास आधुनिकता के गुण-धर्म हैं। पुनर्जागरणकालीन मानवतावाद के केन्द्र में मानव है। ¨¨पीय पुनर्जागरणकालीन विश्वब¨ के इहल¨कवादी दृष्टि © ©न्दर्यब¨ ने मिलकर वैज्ञानिक क्रान्तिय¨ ¨ जन्म दिया। प्रकृति के रहस्य¨ ¨ भेदने वाली मनुष्य की असीमित क्षमताअ¨ ¨ उद्घाटित किया था। उसने मानव की ऐसी तर्कसंगत, विवेकपूर्ण © वैज्ञानिक प्रतिभा रची, ¨ कालान्तर में न्यायमूलक-समरसतापूर्ण समाज की संकल्पना ¨ व्यवहार में उतारने का रास्ता बना। अमेरिकी क्रान्ति के ¨षणापत्र्ा-‘अधिकार संबंधी विध्¨यक, फ्रांसीसी क्रान्तिकारीनागरिक जन एवं मानवाधिकार का ¨षणा-पत्र्ा (डिक्ल्¨रेशन ऑफ दि राइट्स ऑफ मैन), कम्युनिस्ट पार्टी के ¨षणापत्र्ावर्ग-संघर्ष के इतिहास आदि जैसे समय-समय पर निकलने वाल्¨ दस्तावेज आधुनिक राजनीतिक विमर्श के अंग बन गये। यहाँ पर पहली बार भारतीय समाज-इतिहास दार्शनिक अटकलबाजिय¨ तथा ¨-पुराणशास्त्र्ा से पृथक हुआ। आधुनिकता की संकल्पना में व्यक्ति, इतिहास तथा राजनीति की महत्वपूर्ण भूमिका ने बहुलवादी संस्कृति तथा जनतांत्र्ािक मूल्य¨ की रचना में ऐतिहासिक भूमिका निभायी। इन स्थितिय¨ में मनुष्य कबीलाई जीवन, जाति-बिरादरी एवं रूढ़िय¨ से स्वतंत्र्ा ¨ता है। वर्तमान का राजनीतिक ¨कतंत्र्ा कल की आधुनिकता के प्रमाण हैं। प्रशासनिक पारदर्शिता, स्वतंत्र्ाता तथा कार्य-व्यवहार में खुलापन से सम्पूर्ण नागरिक समाज का नाता है। जिसमें, आज का सूचना-अधिकार समाविष्ट है, वह केवल असहमति विर¨धी मत¨ ¨ जानने-सुनने-समझने जैसे शब्द¨ का ख्¨ नहीं है। इसमें शिक्षातंत्र्ा, सूचनातंत्र्ा, सांस्कृतिक तथा स्वयंसेवी संस्थाएँ सभी अन्तर्भूत हैं।

 

भारत परिवर्तन के © में है। इस परिवर्तन की ¨ व्याख्याएँ की जा सकती हैं। पहली ¨ यह कि, ¨ भारत हमारे सामने है, वह पुराना ¨ गया है। इसकी भित्ति दरक रही है। अपने पड़¨सी देश¨ से इसके अच्छे सम्बन्ध नहीं हैं। वह अपने भीतर ही सामाजिक तथा ©¨लिक रूप में टूट रहा है © इसे राजनीतिक रूप में रख पाना असम्भव है। सांस्कृतिक स्तर पर यहाँ तक कि सभ्यता के रूप में भी इस पर कई प्रश्न के दबाव पड़ रहे हैं। जिनसे इन सभ्यताअ¨ का पारंपरिक सन्तुलन बिगड़ रहा है। हालांकि कुछ ¨¨ का ऐसा भी मानना है कि यहाँ की सभ्यता अनेक बार के झंझावात¨ ¨ झेलने के बाद टिकी है। फिर भी समस्या गम्भीर है। भारत पर एक तरफ उपभ¨क्तावाद © भूमण्डलीकरण का आक्रमण ¨ रहा है साथ ही विभिन्न प्रकार के संघर्ष प्रारम्भ ¨ जाने से हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ रही है, ¨ इसके ताने-बाने ¨ भीतर से ¨ रही है।

 

भारत संक्रमणकाल में है। बदलाव तथा अपने पूर्व के बचाव के संक्रमण में। इस संक्रमण की बिल्कुल अलग तरीके से व्याख्या ¨ सकती है कि वह सब एक नये भारत के जन्म की प्रसव-पीड़ा ही है। इस निर्वचन के अनुरूप भारतीय संरचना केवल सांस्कृतिक तत्त्व¨ के संकुल¨ की तथा बहुस्तरीय है, बल्कि बहुआयामी भी है। शायद इसीलिए  यह अपने किसी भी साफ-सुथरे © विश्वस्त चित्र्ाण के प्रयास ¨ असफल करती रहती है। अभिव्यक्ति की इस समस्या का एक कारण यह भी ¨ सकता है कि हम एक अलग-प्रकार के यथार्थ ¨ ©द्धिक स्तर पर समझने, सामाजिक स्तर पर तालमेल बिठाने © उसे स्वीकार करने में नाकाम रहे हैं। यह ऐसा यथार्थ है ¨ परिधि पर स्थित असंगठित समूह¨ © देसी अभिजात वर्ग के उभरने का प्रभाव लिए हुए है। यह दृष्टिक¨ यहाँ के सिर्फ नेताअ¨, अफसरशाह¨ तथा नीति-निय¨जक¨ का है बल्कि अकादमिक विद्वान¨ © एकांत में आसनस्थ मीडिया मर्मज्ञ¨ का भी है। वर्तमान भारत अति संचार का शिकार है। वर्गीय हित¨ © अभिजातवर्गीय असुरक्षा के कारण सूचना © ज्ञान भी विकृत ¨ रहा है। लंबे समय से स्वीकृत सामाजिक मान्यताअ¨ का लगातार उल्लंघन ¨ रहा है। नैतिक स्तर में भारी गिरावट रही है तथा व्यक्ति सामाजिक मूल्य-मान्यताअ¨ तथा वैधानिक विधिय¨ के बुनियादी ढाँचे की अवहेलना कर रहा है। इसकी वजह यह ¨ नहीं कि आज समाज के व्यापक वर्ग ¨ जिन मुद्द¨ का सामना करना पड़ रहा है, वे उन मुद्द¨ से बुनियादी © से पृथक् हैं, जिनका वे लंबे समय से सामना करते रहे हैं। क्या कहीं ऐसा ¨ नहीं है कि व्यापक सामान्य वर्ग एक ऐसे संधिकाल से गुजर रहा है, जहाँ अब पूर्व प्रचलित नैतिक आचार-संहिता अप्रासंगिक ¨ गयी है © नयी संहिता का अब तक प्रादुर्भाव नहीं हुआ है? असल में मूल्य-मान्यताअ¨ के उल्लंघन का विलाप ¨ उस प्रभु वर्ग की ¨ से सुनाई दे रहा है ¨ एक ऐसी मूल्य-प्रणाली से जुड़ा है, जिसका सामान्य जन के लिए कदाचित अब ¨ अर्थ नहीं रह गया है।

 

एक राष्ट्र के रूप में भारत अब तक जिस तरह के ¨¨ द्वारा शासित ¨ता रहा है, उनकी प्रवृत्तियाँ स्पष्ट © पर राष्ट्रवादी © मध्यमार्गी रही हैं। राष्ट्रसंचालन में इन ¨¨ की दृष्टि स्थापित मान्यताअ¨ © पूर्वनिर्धारित ©-तरीक¨ की थी। इस दुनिया में स्थायित्व था। वृद्धि © विकास का सातत्य था © राष्ट्र-राज्य टिकाऊ लगता था। आज एक राष्ट्र के रूप में हमारा आत्मविश्वास टूट रहा है। उम्मीदें खत्म ¨ रही हैं। यद्यपि वंचित वर्ग उम्मीद¨ में है। उसे लगता है कि विकासवादी प्रतिमान एक एक दिन उन्हें मुख्यधारा का मानव बनायेगा। पहल्¨ लगता था कि हम किसी किसी रूप में अवश्य टिके रहेंगे। स्वास्थ-शिक्षा की न्यूनतम बुनियादी सहुलियतें मिलती रहेंगी। विकास के सूचकांक ऊपर चढ़ेंगे। ©सत-आयु में वृद्धि, बाल मृत्युदर में कमी © ¨ गरीबी-रेखा से ऊपर उठेंगे। साक्षरता दर में वृद्धि ¨ती रहेगी। ज्यादातर ¨¨ ¨ उद्यम के अवसर प्राप्त ¨ंगे। व्यापार, दस्तकारी की वस्तुअ¨ का विपणन, कला, डिजाइन आदि ¨ यथ¨चित सम्मान मिल्¨गा। इन सारे कार¨बार¨ के जारी रहने के बावजूद हमारा उत्साह आत्मविश्वास कम ¨ रहा है। ऐसा प्रतीत नहीं ¨ता कि यह सब कार्य भारत की तस्वीर बदल रहा है। पहल्¨ जैसा सहय¨जन © आत्मविश्वास अब इसमें नहीं दीखता। आज के भारत में अब यह उम्मीद कम ¨ने लगी है कि राष्ट्रीय समृद्धि में हर व्यक्ति ¨ हिस्सा मिल्¨गा। गरीब से ल्¨कर मध्यवर्ग तक सभी में असुरक्षा की भावना बढ़ रही है। शायद बेहद धनी वर्ग ही इसका अपवाद ¨ © इसी वर्ग की निष्ठुर-भद्दी जीवनश्©ली ने सामान्य-जन के मन में विद्वेष तथा आक्र¨ पैदा कर दिया। अमीरी-गरीबी की खाईं में ¨ असमानता © बेर¨जगारी की स्थिति इसका प्रमुख कारण है। इसी ने अलगाववाद © नक्सलवाद पैदा करने में अपनी प्रबल भूमिका अदा की है। इन स्थितिय¨ ने प्रगति © अच्छे जीवन के बारे में उनकी पुरानी धारणाअ¨ ¨ बिगाड़ दिया है। जीवन की संभावनाअ¨ के विषय में आत्मविश्वास © उम्मीद की कमी के साथ अच्छा काम कर सकने की राज्य की क्षमताअ¨ पर भी सवाल खड़ा करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। अस्मिताअ¨ विश्¨षतः राष्ट्रीय अस्मिताअ¨ का क्षरण ¨ रहा है। सरकार के प्रति अविश्वास पैदा ¨ रहा है। उसकी नियामक संस्थाअ¨ से भर¨सा उठ रहा है। संबंध¨ में ¨ रहे परिवर्तन¨ ¨ नये ढंग से समझने की ¨शिश ¨ रही है। ज्यादातर ¨¨ का भविष्य अनिश्चित है। चार¨ ¨ द्वैधवृत्ति फैली है। वामपंथ-दक्षिणपंथ, धार्मिक-धर्मनिरपेक्ष, परंपरानिष्ठ-पश्चिमीकृत तथा आधुनिक सभी ¨ इस द्वैध में हैं। संस्थाएँ अब उम्मीद के अनुसार कार्य नहीं कर पा रही हैं। असंगठित क्ष्¨त्र्ा का दायरा बढ़ रहा है। उसमें जाति © समुदाय की भी संरचनाएँ निर्मित ¨ रही हैं। शहर की ¨ पलायन करने वाल्¨ समुदाय- दलित-पिछड़े तथा सामाजिक जड़¨ से कटे ¨¨ की संख्या बढ़ रही है। बेघर बच्चे अपना श्रम तथा शरीर बेच रहे हैं।

 

आधुनिकीकरण की प्रक्रिया का विकास चयनात्मक तथा खण्डनात्मक था। यह भारतीय समाज की परिवार, जाति एवं ग्राम समुदाय जैसी लघु-संरचनाअ¨ के साथ समेकित नहीं था। इन स्तर¨ पर, विश्¨षतः 1857 के विद्र¨ के बाद अंग्रेज¨ ने न्यूनतम हस्तक्ष्¨ की नीति का पालन किया। इसके अतिरिक्त श्¨ भारतीय समाज की तुलना में इन लघु संरचना की स्थिरता स्वायत्तता से कुछ अंग्रेज प्रशासक त्र्ाुटिपूर्वक प्रभावित थ्¨ यह विश्¨ रूप से ग्राम-समुदाय की अवधारणा तथा जाति ¨ दिये गये महत्व के विषय में था। स्वतंत्र्ाता आन्द¨लन तथा उसके बाद आधुनिकीकरण की एक नयी राजनैतिक संस्कृति का मार्ग प्रशस्त हुआ। स्वतंत्र्ाता के बाद भारत में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में इसके ©पनिवेशिक प्रतिमान से एक आधारभूत अन्तर आया है। विकास की रणनीति के समेकित भाग के रूप में आधुनिकीकरण की अब सांस्कृतिक संरचनात्मक व्यवस्थाअ¨ के सभी स्तर¨ के लिए कल्पना की गयी है। अंग्रेजी शासनकाल में बृहद् संरचनाअ¨, लघु संरचनाअ¨ तथा लघु-वृहद् परंपराअ¨ में असंगति ¨ अब त्याग दिया गया।

 

आधुनिकीकरण की ©पनिवेशिक अवस्था ने अनेक संरचनात्मक चुन©तिय¨ ¨ गंभीरता से व्यक्त नहीं किया ¨ कि स्वतंत्र्ा भारत में इस प्रक्रिया ¨ पूर्ण ¨ने के समय उठ गयी थी। जैसे ही आधुनिकीकरण की खंडात्मक प्रकृति सभी कुछ समाहित करने वाली बन जाती है, संरचनात्मक स्वायत्तता की प्रासंगिकता आघात सहन करने की प्रणाली के रूप में, प्रक्रिया द्वारा जनित तनाव, नीतिगत क्रान्तिकारी परिवर्तन¨ के साथ परिवर्तन की रणनीति में अत्यावश्यक © अधिक समन्वयकारी ¨ते हैं। भारतीय दृश्य में ऐसा प्रतीत ¨ता है कि निरन्तर तनाव¨ © अन्तर्विर¨¨ के बावजूद संस्थात्मक विखण्डन के अवसर न्यूनतम हैं। राजनैतिक व्यवस्था में संस्थात्मक मूल्य पर्याप्त मात्र्ाा में संस्थायीकृत ¨ चुके हैं। अभिजन के विभिन्न स्तर¨ के मध्य सांस्कृतिक दूरी, ¨ हाल में ही बढ़ी है, इतनी दूर नहीं जाती कि आधुनिकीकरण की विचारधारा के बारे में प्रमुख संघर्ष प्रारम्भ कर दे। जाति, ¨ परंपरा द्वारा स्वीकृत असमानता के संस्थात्मक स्वरूप का प्रतिनिधित्व करती है, अब समितिय¨ में अपने स्वयं के तार्किक स्व-रूपांतरण द्वारा असमानता असमानतावाद के खिलाफ लड़ाई लड़ रही है। परंपरा के अनेक स्वतंत्र्ा अथवा संवर्गात्मक मूल्य¨ ने अपने आपक¨ आधुनिकीकरण की सांस्कृतिक व्यवस्था के प्रति अनुकूलन बनाने के लिए आश्चर्यजनक सीमा तक लचीलापन दर्शाया है। इन परम्पराअ¨ में कुछ अभी भी अस्तित्वमान हैं।

 

आज के भारत के संदर्भ में आधुनिकीकरण ¨ हम पाते हैं कि पारंपरिक भूमिका-संरचनाअ¨ का स्थान आधुनिक भूमिका- संरचनाअ¨ द्वारा ल्¨ने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, ल्¨किन ¨ ¨ इन भूमिकाअ¨ ¨ निभा रहे हैं, वे आधुनिकता के मूल्य¨ के स्थान पर परंपरा के संवर्गात्मक मूल्य¨ ¨ प्रायः संज¨ये हुए हैं। यहाँ जाति स्वयं अनेक प्रकायर्¨ ¨ अपना रही है ¨ कि तार्किक रूप से निगमीय समूह¨ के ¨ते हैं। सामान्यतः कर्मकाण्डीय व्यवस्था एवं धर्म अनिवार्यतः पारंपरिक प्रकृति के संवर्गात्मक मूल्य¨ पर आधारित ¨ते हैं, पतन का प्रमाण नहीं दर्शाते © ही निकट भविष्य में इनकी विलुप्ति की ¨ संभावना दिखती है। संवर्गात्मक मूल्य¨ में से अनेक एक समाज से अन्य समाज में भिन्न ¨ते हैं, ऐसी सदैव संभावना ¨ सकती है, जिसमें पारंपरिक © आधुनिक मूल्य¨ का अनूठा मिश्रण ¨

 

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Received on 02.12.2016       Modified on 10.12.2016

Accepted on 28.12.2016      © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 4(4): Oct.- Dec., 2016; Page 206-210.